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मिथिला मखाना : परंपरा ,स्वाद और सेहत की अनोखी कहानी

       Gaurav Jha
  [WRITER, JOURNALIST & COLUMNIST ]

बिहार के मिथिला (Mithila) में एक कहावत काफी मशहूर है- पग-पग पोखरि, माछ-मखान। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। मिथिला की पावन धरती, जहाँ ज्ञान, संस्कृति और परंपरा की खुशबू बसती है, वहीं की पहचान है मिथिला मखाना। इसे यूँ ही “तालाबों का सोना” नहीं कहा जाता। सदियों से मखाना मिथिला के किसानों की मेहनत, प्रकृति के वरदान और समृद्ध परंपरा का प्रतीक रहा है।कहा जाता है, मिथिला के तालाबों में सिर्फ पानी नहीं, मेहनत और सपने भी पलते हैं। कांटों से भरे गहरे पानी में उतरकर किसान मखाने के बीज निकालते हैं। यह सिर्फ खेती नहीं, पीढ़ियों से चली आ रही एक विरासत है। हर दाना किसानों की मेहनत और मिथिला की मिट्टी की कहानी कहता है।
       
  
   लिहाज़ा भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। मिथिला का मखाना अपनी गुणवत्ता,स्वादिष्ट पोषक तत्व और औषधीय गुणों के कारण देश और विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध हो चुका है। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि मिथिला में मखाना की खेती और प्रसंस्करण में काफी तेजी आई है।दर असल मिथिला की पहचान माछ, पान और मखाने से है।
     
 
 लिहाज़ा विश्व में कोई अन्य स्थान मखाना से उतना घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ नहीं है जितना कि मिथिला है।मिथिला,जो पूर्व में विदेह साम्राज्य था। जिसमें उत्तरी बिहार और नेपाल का तराई क्षेत्र शामिल था। कई जल निकायों से घिरा हुआ था और सदियों से मखाना की संगठित खेती का केंद्र रहा है । हालांकि यह उत्तरी भारत और चीन, जापान और कोरिया के कुछ हिस्सों में जंगली और अर्ध-जंगली रूपों में उगता था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'मखाना ' के लेखक और प्रख्यात मखाना शोधकर्ता विद्यानाथ झा ने कहा -----
मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार और मिथिला के अररिया जिले भारत के कुल मखाना उत्पादन का 80 से 90% हिस्सा उत्पादित करते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि मखाना सामाजिक स्थिति और जाति की परवाह किए बिना लोगों के रीति-रिवाजों और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अभिन्न अंग है और जन्म से लेकर मृत्यु तक के समारोहों में इसका उपयोग किया जाता है। 
         
    
      मैथिली की एक लोकप्रिय कहावत इस मिथिला की समृद्घ विरासत,संस्कृति,ज्ञान के महत्व को इस प्रकार व्यक्त करती है: ---------

“पग- पग पोखर माछ माखन
सरस बोल मुस्की मुख पान
विद्या वैभव शांति प्रतीक
सरस क्षेत्र मिथिलांचल ठीके।”  

यह कहावत मिथिला क्षेत्र के सुंदर संस्कृति और समृद्ध विरासत को दर्शाती है। मिथिला में आपको तालाब, मछलियाँ और मखाना मिल जायेंगे। लोग पान चबाते हुए मधुर स्वर में बतियाते मिलते हैं। मिथिला ज्ञान, समृद्धि और शांति से परिपूर्ण है.......


मिथिला की पहचान बन चुके मखाना को वैश्विक बाजार में और मजबूत स्थान दिलाने के लिए किसानों और युवाओं को अब उत्पादन के क्षेत्र में ध्यान देने की जरूरत है।लिहाज़ा यदि गांव स्तर पर मखाना आधारित लघु उद्योग स्थापित किए जाएं तो किसानों की निश्चित तौर पर आय बढ़ेगी और स्थानीय युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे।लेकिन मखाना की ज्यादा उत्पादन बढ़ाने हेतु कदम उठाना चाहिए।छोटे-छोटे लघु उद्योग के ज़रिए भी रोज़गार के अवसर सृजन होगें।जिससे आने वाले दिनों में युवाओं को इस क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करने की जरूरत है।
   
  
    मिथिला मखाना खासतौर पर बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र और नेपाल में उगाई जाने वाली मखाना की एक विशेष प्रजाति है। मिथिला में मखाना को 'मखान' भी कहा जाता है। यह मिथिला की तीन प्रतिष्ठित सांस्कृतिक पहचानों में से एक हैः तालाब, मछली और मखान (मैथिली भाषा में : पग-पग पोखरी, माछ, मखान) । इसका उपयोग मैथिली ब्राह्मण और कायस्थों के नवविवाहित जोड़ों के लिए मनाए जाने वाले 'कोजगरा' त्योहार में भी अक्सर किया जाता रहा है।
             
   
 हालांकि केंद्र सरकार ने मिथिला के मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग (Geographical Indication Tag) दे दिया है। यह एक प्रकार का लेबल होता है,जिसमें किसी प्रॉडक्‍ट को विशेष भौगोलि‍क पहचान दी जाती है। ऐसा प्रॉडक्‍ट जिसकी विशेषता या फिर प्रतिष्‍ठा मुख्‍य रूप से प्राकृतिक और मानवीय कारकों पर निर्भर करती है।भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है।

मिथिला में वैसे तो मखाना बहुत पहले से काफ़ी प्रसिद्ध रहा है।यह ऐसी फसल है, जिसे पानी में उगाया जाता है। मखाने में करीब 9.7 ग्राम प्रोटीन और 14.5 ग्राम फाइबर होता है। यह कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है।यह सेहत के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है।
          
     
    वहीं दूसरी तरफ, हम जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर जी आई टैग क्या है?इसकी शुरुआत कब हुई थी?हालांकि संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में अधिनियम पारित किया। जिसे अंग्रेजी में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए जी आई टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ।यह एक प्रकार का लेबल होता है,जिसमें किसी प्रॉडक्‍ट को विशेष भौगोलि‍क पहचान दी जाती है। ऐसा प्रॉडक्‍ट जिसकी विशेषता या फिर प्रतिष्‍ठा मुख्‍य रूप से प्राकृतिक और मानवीय कारकों पर निर्भर करती है।
      
  
      इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है। ये टैग किसी खास भौगोलिक परिस्थिति में पाई जाने वाली या फिर तैयार की जाने वाली वस्तुओं के दूसरे स्थानों पर गैर-कानूनी प्रयोग को रोकना है।हालांकि क्या आपके जहन में यह सवाल उठता है कि आखिर किन उत्पादों पर दिया जाता है GI Tag?आपको बता दें कि खेती से जुड़े हुए उत्पाद।इस पर दिया जाता है जी आई टैग। इसका अर्थ यह है कि किसी खास क्षेत्र में जो चीजें पैदा होती हैं, उसे यह टैग मिल जाता है। 
       

जैसे उत्तराखंड का तेजपात, बासमती चावल, दार्जिलिंग टी, भागलपुर का जरदालु आम। हैंडीक्राफ्ट्स के क्षेत्र में भी जीआई टैग दिया जाता है। जैसे कि जैसे बनारस की साड़ी, चंदेरी साड़ी, महाराष्ट्र सोलापुर का चद्दर, कर्नाटक का मैसूर सिल्क। तमिलनाडु का कांजीवरम सिल्क। इसके अलावा खाद्य सामग्री को भी यह टैग दिया जाता है। जैसे आंध्र प्रदेश में तिरुपति का लड्डू, राजस्थान की बीकानेरी भुजिया, तेलंगाना के हैदराबाद की हलीम, पश्चिम बंगाल का रसोगुल्ला, मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा ,मिथिला मखाना आदि।मखाना बिहार और खासकर मिथिला का एक महत्वपूर्ण कृषि उत्पाद है। दुनिया के कुल मखाना उत्पादन का 80 से 85 प्रतिशत मिथिला में होता है। 
            
      
   दर असल मखाना बोर्ड किसानों को आधुनिक तकनीकों के प्रशिक्षण के साथ-साथ जरूरी संसाधन और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगा, ताकि वे आधुनिक तरीके से मखाना की खेती करने में सक्षम हो सकें। मखाना मिथिला की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रहा है। इसका उपयोग अब धार्मिक अनुष्ठानों और पर्व-त्योहारों तक सीमित नहीं है।मखाना बोर्ड वैश्विक बाजार तक मखाना की पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को सशक्त बनाने, रोजगार के अवसर पैदा करने, निर्यात को बढ़ावा देने के साथ बिहार की समग्र आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देगा। मखाना बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि किसानों को आवश्यक उपकरण, तकनीक और प्रशिक्षण की सुविधा मिले।
       
  
    वहीं दूसरी तरफ अगर मखाना की प्रोसेसिंग एवं पैकेजिंग के क्षेत्र में बड़ी कंपनियां मिथिला आकर निवेश करें, मखाना के विभिन्न उत्पादों को मार्केट से लिंक किया जाए और उसकी बेहतर ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग हो, तो बड़ी संख्या में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और मिथिला से पलायन को रोकने में भी कहीं न कहीं मदद मिलेगी। निश्चित रूप से मखाना मिथिला और बिहार की आने वाली पीढ़ियों के लिए उद्यमिता और रोजगार का एक स्थायी एवं समृद्ध साधन बनेगा।पिछले कुछ वर्षों में, मखाना एक सुपरफूड के रूप में काफी लोकप्रिय हो गया है। लेकिन बहुत कम लोगों को यह ज्ञात हैं कि यह क्या है। अगर आप इसे गूगल पर खोजेंगे, तो संभवतः इसे गलती से कमल के बीज के रूप में दिखाया जाएगा।
          

       दरअसल, मखाना निम्फेएसी कुल से संबंधित कांटेदार जल लिली (यूरीएल फेरॉक्स) के काले बीजों का नरम, सफेद गूदा होता है । बीजों को इकट्ठा करके सुखाया जाता है, भुना जाता है और तोड़कर मखाना लावा प्राप्त किया जाता है, जो बीज की पोषक परत या पेरिस्पर्म होता है।मणिपुरी में थांगजिंग, कश्मीरी में जुवार, असमिया में निखोरी और अंग्रेजी में फॉक्सनट या गोरगॉन नट जैसे विभिन्न नामों से जाना जाने वाला मखाना अपने पौष्टिक और औषधीय गुणों के कारण विश्व प्रसिद्ध है। बहरहाल मखाना मिथिला में काफ़ी शुमार है।व्रत में भी मखाने का इस्तेमाल अमूमन किया जाता है।मखाना शब्द संस्कृत के 'मख' (पवित्र अनुष्ठान) और 'अन्ना' (अनाज) से मिलकर बना है। यह सामाजिक रीति-रिवाजों का इतना अभिन्न अंग है कि इसे मेहमानों को भेंट किया जाता है, उपहार के रूप में दिया जाता है और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में इसका उपयोग होता है। 
               

     वहीं दूसरी तरफ पूर्णिया स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर और वैज्ञानिक अनिल कुमार के अनुसार, “बिहार राजपत्र में मिथिला के मधुबनी सदर में 17वीं शताब्दी में ही मखाने की व्यावसायिक खेती का उल्लेख मिलता है।” पिछले तीन वर्षों से वे मखाने के लिए जीआई (ग्रुप-ग्रेड) के दावे का समर्थन करने वाले दस्तावेजी साक्ष्य जुटाने के लिए बिहार के पुस्तकालयों में छानबीन कर रहे हैं। उन्होंने अब सभी संबंधित दस्तावेज़ जी आई समिति को सौंप दिए हैं, जो यह तय करेगी कि मखाने को “मिथिला मखाना” का दर्जा दिया जाना चाहिए या नहीं। मिथिला में उत्पादित मखाना अपनी विशिष्ट विशेषताओं के लिए जाना जाता है, जिसका श्रेय वहां की मिट्टी, जल स्रोतों, जलवायु और स्थलाकृति को जाता है।बिहार के अलावा, पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के खान-पान में भी मखाना का विशेष स्थान है। निश्चित तौर पर मिथिला मखाना को जी आई टैग मिलने से लोगों की आजीविका में वृद्धि होने की संभावना है।बशर्ते मखाना के बड़े पैमाने पर खेती करने के लिए किसानों के साथ-साथ युवाओं को भी आगे आना चाहिए। जिससे मखाना की खेती करने से रोज़गार के नए अवसर सृजित होगें।
    
     
    मखाना की खेती करने वाले लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव हो सकता है।खासकर मिथिला मखाना वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान बन रही है।पिछले कुछ वर्षों में, मखाना एक सुपरफूड के रूप में वैश्विक स्तर पर काफी लोकप्रिय हो चुका है।मिथिला में मखाना सिर्फ फसल नहीं, भावना है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक इसकी अपनी पहचान है। यहाँ की माताएँ मखाने की खीर बनाकर प्रेम परोसती हैं, और किसान इसे अपने गर्व के रूप में देखते हैं।आज मिथिला मखाना देश ही नहीं, विदेशों में भी प्रसिद्ध है। GI Tag मिलने के बाद इसकी पहचान और बढ़ी है। 

यह मिथिला की मिट्टी, मेहनत और संस्कृति की कहानी दुनिया तक पहुँचा रहा है।मिथिला की आत्मा,किसानों का गर्व और हर दाने में छिपी सुनहरी कहानी।
“जहाँ तालाबों में सोना खिलता है, वही है मिथिला… और वही है मिथिला मखाना।”। “मखाना सिर्फ फसल नहीं, मिथिला की आत्मा है।”


@WriterGauravShekharJha

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