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मिथिला मखाना : परंपरा ,स्वाद और सेहत की अनोखी कहानी

        Gaurav Jha   [WRITER, JOURNALIST & COLUMNIST ] बिहार के मिथिला (Mithila) में एक कहावत काफी मशहूर है- पग-पग पोखरि, माछ-मखान। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। मिथिला की पावन धरती, जहाँ ज्ञान, संस्कृति और परंपरा की खुशबू बसती है, वहीं की पहचान है मिथिला मखाना। इसे यूँ ही “तालाबों का सोना” नहीं कहा जाता। सदियों से मखाना मिथिला के किसानों की मेहनत, प्रकृति के वरदान और समृद्ध परंपरा का प्रतीक रहा है।कहा जाता है, मिथिला के तालाबों में सिर्फ पानी नहीं, मेहनत और सपने भी पलते हैं। कांटों से भरे गहरे पानी में उतरकर किसान मखाने के बीज निकालते हैं। यह सिर्फ खेती नहीं, पीढ़ियों से चली आ रही एक विरासत है। हर दाना किसानों की मेहनत और मिथिला की मिट्टी की कहानी कहता है।               लिहाज़ा भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। मिथिला का मखाना अपनी गुणवत्ता,स्वादिष्ट पोषक तत्व और औषधीय गुणों के कारण देश और विदेशों मे...
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दिल्ली का सबसे अनोखा ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम : ट्वाॅयलेट का दिलचस्प सफर / Sulabh International Museum Of Toilets / Gaurav Jha

               Gaurav Jha    (Writer,Journalist & Columnist) दिल्ली की भीड़-भाड़ से थोड़ी दूर। नई दिल्ली में दशरथ पुरी मैट्रो स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित है- सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स। यह स्थित है, पालम, महावीर एनक्लेव,डाबरी रोड,नई दिल्ली में। दरअसल एक ऐसी जगह, जिसके बारे में सुनकर लोग पहले हँसते हैं और फिर हैरान रह जाते हैं। क्या आपने कभी 'टॉयलेट म्यूज़ियम' के बारे में सुना है? यह कोई मजाक नहीं है। यह है दुनिया का अनोखा संग्रहालय सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स, जो स्थित है,महावीर एनक्लेव,पालम,नई दिल्ली में। लेकिन सवाल यह है ट्वाॅयलेट का भी म्यूज़ियम? आखिर क्यों इस कहानी की शुरुआत होती है एक इंसान से, पद्मविभूषण से अलंकृत,समाज-सुधारक,स्वच्छता के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक जी से।                       गौरतलब 'म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' सिर्फ एक म्यूज़ियम नहीं... यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें इंसान की सभ्यता का सबसे अनदेखा सच दिखा...

सुलभ क्रांति के जनक : पद्म विभूषण डाँ. विंदेश्वर पाठक

  WRITER GAURAV JHA  सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार-आंदोलन के जनक कहे जाने वाले पद्म विभूषण से अलंकृत महान व्यक्त्वि डॉ. विन्देश्वर पाठक जी थे। उन्होंने सिर्फ़ महात्मा गाँधी जी के सपने को पूरा नहीं किया। बल्कि स्कैवेंजरों के मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए जीवन भर संघर्षरत रहा और अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। अक्सर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कहा करते थे कि ------------- " शायद मेरा पुनर्जन्म नहीं हो,किंतु यदि ऐसा होता है, तब मेरी इच्छा है कि मेरा जन्म स्कैवेंजरों के परिवार में हो, जिससे मैं सर पर मैला ढ़ोने के अमानवीय, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तथा घृणित कार्य से उन्हें मुक्ति दिला सकूँ" कहीं न कहीं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी महात्मा गाँधी जी के विचारों से प्रभावित थे,और उनके विचारों को सीने में लेकर चला और लाखों स्कैवेंजरों, 'अस्पृश्यों' को मानवाधिकार और सम्मान दिलाने के लिए महात्मा गाँधी के अधूरे सपने को पूरा किया। दर असल पद्म विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का जन्म 2 अप्रैल, 1943 को बिहार के वैशाली जिले के रामपुर के बघेल ग...