दिल्ली का सबसे अनोखा ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम : ट्वाॅयलेट का दिलचस्प सफर / Sulabh International Museum Of Toilets / Gaurav Jha
Gaurav Jha
(Writer,Journalist & Columnist)
दिल्ली की भीड़-भाड़ से थोड़ी दूर। नई दिल्ली में दशरथ पुरी मैट्रो स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित है- सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स। यह स्थित है, पालम, महावीर एनक्लेव,डाबरी रोड,नई दिल्ली में। दरअसल एक ऐसी जगह, जिसके बारे में सुनकर लोग पहले हँसते हैं और फिर हैरान रह जाते हैं। क्या आपने कभी 'टॉयलेट म्यूज़ियम' के बारे में सुना है? यह कोई मजाक नहीं है। यह है दुनिया का अनोखा संग्रहालय सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स, जो स्थित है,महावीर एनक्लेव,पालम,नई दिल्ली में। लेकिन सवाल यह है ट्वाॅयलेट का भी म्यूज़ियम? आखिर क्यों इस कहानी की शुरुआत होती है एक इंसान से, पद्मविभूषण से अलंकृत,समाज-सुधारक,स्वच्छता के प्रणेता डॉ. विन्देश्वर पाठक जी से।
गौरतलब 'म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' सिर्फ एक म्यूज़ियम नहीं... यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें इंसान की सभ्यता का सबसे अनदेखा सच दिखाती है। दरअसल, कहानी की शुरुआत होती है एक आम इंसान से, जिसने एक दीपक की तरह अपनी रोशनी से लाखों स्कैवेंजर, अस्पृश्य तथा समाज के वंचित गरीब तबक़े के लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला दिया। स्कैवेंजरों के सामाजिक उत्थान, सामाजिक कल्याण, सामाजिक सम्मान, स्वच्छता,सर पर मैला ढ़ोने जैसी अमानवीय कुप्रथा को समाप्त करने के लिए पद्मविभूषण,समाज-सुधारक डॉ. विन्देश्वर पाठक जी जीवन भर संघर्षरत रहे। वे एक दीपक की तरह देश ही नहीं, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रकाश से अंधेरा मिटाने का निरंतर काम किया।आज उसी का परिणाम है कि लाखों लोगों के जीवन में नयी ऊर्जा का संचार हुआ है । 'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक तथा पद्मविभूषण से सम्मानित,युग-दृष्टा,समाज-सुधारक डॉ.विंदेश्वर पाठक जी थे।जब उन्होंने समाज में गंदगी,बीमारियां और अपमान को बेहद क़रीब से देखा तो उन्होंने एक मिशन शुरू किया, जिसका नाम था 'सुलभ इंटरनेशनल'। लेकिन सिर्फ़ शौचालय बनाना ही उनका लक्ष्य नहीं था। वे चाहते थे कि लोग समझें। स्वच्छता का इतिहास भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उसका वर्तमान ।
दरअसल, सुलभ इंटरनेशनल शौचालय - संग्रहालय वैसे समाज का वर्णन करता है,जो स्वच्छता के क्षेत्र में दूसरों की पीड़ा और कष्ट का बोध कराती है। 'म्यूज़ियम ऑफ ट्वाॅयलेट्स' हमें यह सिखाती है कि खाना और शौच करना शरीर के आवश्यक कार्य हैं। इसमें कहना चाहूंगा कि मनुष्य खाना को अत्यधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण समझता है लेकिन शौच को नहीं । स्वस्थ मन, स्वस्थ तन और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए एक जितना महत्वपूर्ण है,उससे कहीं ज्यादा दूसरा।
समाज - सुधारक, पद्मविभूषण सहित अनेकानेक सम्मान से सम्मानित डॉ. विंदेश्वर पाठक जी, समाज के निम्न तबक़े के लोगों के उत्थान के लिए जीवन भर अपना सफर अनवरत जारी रखा। सफ़र शुरू करने के पश्चात उन्हें काफ़ी कुछ सहना पड़ा।
लोग हँसे, ताने दिए, शौचालय बनाकर देश बदलेगा। इस प्रकार के विचार और प्रतिक्रिया थे लोगों के उनके प्रति। लेकिन उन्होंने हार नहीं माना। बीते दशकों में उन्होंने अपनी चुनी हुई दिशा में जो काम अनवरत उन्होंने किया। राष्ट्रपति महात्मा गांधी 'बापू' के विचारों पर चलकर एक आम आदमी, एक युवा समाजसेवी, पद्म-विभूषण डॉ. विंदेश्वर पाठक जी ने सिर्फ़ महात्मा गांधी जी का सपना पूरा नहीं किया, बल्कि उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट सामाजिक कार्य ने उन्हें समूचे देश ही नहीं, वरन् अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उन्होंने देश भर में वह काम करके दिखाया, जो एक सामान्य व्यक्ति के सोच में भी परे है। उनकी दूरदर्शिता सोच,संकल्प, दृढ़विश्वास, काम के प्रति निष्ठा,धैर्य और समर्पण यह दिखाती है कि, "दुनिया में असंभव कुछ नहीं होता, बस व्यक्ति की सोच बड़ी होनी चाहिए।" 'आदमी के साहस से बढ़कर कुछ नहीं होता है।'
लिहाज़ा दिल्ली की भीड़-भाड़ सड़कों के बीच एक ऐसी जगह छिपी है, जहाँ क़दम रखते ही आप एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं-------------- 'ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम' जिन्हें हम म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स' के नाम से भी जानते हैं,जो स्थित है महावीर एक्कलेव,पालम, डाबरी रोड,नई दिल्ली में। हालाँकि शौचालयों का इतिहास हड़प्पा, सिंधु घाटी सभ्यता और मु-अन-जोदड़ो की संस्कृतियों जितना प्राचीन है।यहाँ तक कि मुगलकाल में अकबर के राजभवन के अतिरिक्त राजस्थान में भी इसके अवशेष प्राप्त हुए हैं। प्रसिद्ध गायक जेनिफर लाॅपेज को उनके पूर्व प्रेमी एफ्लेक ने उनके जन्मदिन के अवसर पर महँगा शौचालय उन्हें उपहार में दिया था। वहीं दूसरी तरफ, दुनिया में किसी को पुस्तकों के संग्रह का, कला-संग्रहालय आदि का शौक होता है, लेकिन उन्हें म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स (Museums of Toilets) का विचार उनके मन में कैसे आया? स्वच्छता के क्षेत्र में समाज-सुधारक, पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी का कहना था कि -------
“जब वे लंदन की यात्रा पर गए थे तो टॉयलेट म्यूजियम की प्रेरणा उन्हें लंदन के मैडम तुसाद वैक्स म्यूजियम (Madam Tussauds Wax Museum) को देखने के बाद मिली। उस म्यूज़ियम को देखने का अवसर मिला। उन्होंने सोचा, यदि वे एक वैक्स म्यूजियम बना सकते हैं तो वे टॉयलेट म्यूजियम क्यों नहीं रख सकते? उन्होंने विश्व के सभी देशों को पत्र लिखकर म्यूज़ियम के लिए सामग्री जुटाई।”
दरअसल समाज- सुधारक, सुलभ आंदोलन के प्रवाहक डॉ. विंदेश्वर पाठक जी का कहना था कि —
“कार्यक्षमता दृष्टि, धैर्य और समर्पण का संयोजन है। हर एक को ईमानदारी और गंभीरता से कार्य करना चाहिए।”
“जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण था कि आत्म-सम्मान में रहें। ईश्वर हमारी सहायता करता है, दूसरों की सहायता करने के लिए कर्म को धर्म, दर्शन और जीवन के उत्तम रूपों से जोड़ें।”
दरअसल सुलभ – आंदोलन के 'जनक', समाज सुधारक, पद्मविभूषण से अलंकृत डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी ने जब लंदन में मैडम तुषाद वैक्स म्यूज़ियम को पहली बार देखा और उसी वक्त उनके जहन में 'शौचालय संग्रहालय' बनाने का आइडिया आया।
बहरहाल उन्होंने कहा था कि शौचालय के बारे में कोई भी बात नहीं करना चाहता और इस काम में लगे लोगों को हीन भावना से देखा जाता है। इस तरह के अनुभवों से प्रेरित होकर वे अनोखे टॉयलेट्स म्यूज़ियम में मु-अन-जोदड़ो, और हड़प्पा संस्कृति के दौर में इस्तेमाल होने वाले शौचालयों को दिखाया गया है। क्या आपने दोस्तों इंसानों के शौचालयों के बारे में सुना होगा? लेकिन क्या आपने जानवरों के शौचालय के बारे में सुना है? थाइलैंड में हाथियों के लिए बनने वाले अनोखा शौचालय या फिर पेरिस में घरेलू कुत्ते,बिल्लियों के लिए बने शौचालयों का अद्भूत और अनोखा संग्रहालय भी यहाँ दिखाया गया है।यह सुलभ इंटरनेशनल 'म्यूज़ियम ऑफ ट्वाॅयलेट्स' संग्रहालय,जो विश्व में अपनी तरह का अकेला और अनोखा संग्रहालय है। यहां आने पर लोग पहले हंसते हैं और फिर हैरान रह जाते हैं। क्या आपने कभी टॉयलेट म्यूज़ियम के बारे में सुना है? यह कोई मज़ाक नहीं है, यह है दुनिया का अनोखा संग्रहालय। सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ टॉयलेट्स। लेकिन सवाल यह है कि टॉयलेट का भी म्यूजियम? हालांकि यह टॉयलेट म्यूज़ियम ( MUSEUM OF TOILETS ) की स्थापना के पीछे कुछ उद्देश्य था -------------------
शौचालयों के विकास के ऐतिहासिक स्वरूप, शौचालयों के विकास के इतिहास को रूप देने और छात्रों को शिक्षित करना उनका उद्देश्य था। विश्व भर में शौचालय के क्षेत्र में किए गए प्रयासों को नीति- निर्णायकों को समझाने में सहायता प्रदान करना। वहीं दूसरी तरफ, समकालीन विश्व में प्रयुक्त और पूर्व में अपनाई गई संरचना,साम्रगी और तकनीकी के विषय में शोधकर्ताओं को सूचना प्रदान करना।स्वच्छता विशेषज्ञों को वर्तमान समस्या से छुटकारा के लिए, समस्या से निज़ात पाने के लिए अतीत से सीखने में सहायता प्रदान करना,जो ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम,अतीत के बारे में जानने,समझने और सीखने का मुख्य ज़रिया बन सकता था। विश्व में वर्तमान समस्या की दुर्दशा के लिए, तथा स्वच्छता से निजात पाने के लिए अतीत से सीखने में सहायता प्रदान करना।
दरअसल सुलभ इंटरनेशनल “टॉयलेट्स ऑफ म्यूज़ियम ” बनना एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह टॉयलेट म्यूजियम सिंधु-घाटी सभ्यता के विकास के प्रारंभ से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक के विकास के क्रमबद्ध चित्रण को दर्शाता है। यह टॉयलेट संग्रहालय प्राचीन मिस्र, बेबीलोनिया, यूनान,जेरूसलेम,क्रीट, रोम और अन्य सभ्यताओं के शौचालयों और स्वच्छता को प्रदर्शित करता है।समाज-सुधारक,प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता,'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक,पद्मविभूषण डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी को भारत और विश्वभर में पांच दशकों से अधिक समय तक चले राष्ट्रव्यापी स्वच्छता अभियान के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है।उनके योगदान ने लाखों अत्यंत वंचित,गरीब तबक़े के लोगों,सर पर मैला ढ़ोने वाले अमानवीय कुप्रथा के पीड़ित लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण और बड़ा बदलाव ला दिया।उनका कहना था ------------------------------------
" अब संग्रहालय अभिजन ग्राहकों के लिए शहरी सजावट मात्र नहीं रह गए हैं,वे धीरे-धीरे सामाजिक सुधार के उपकरण बनते जा रहे हैं।संग्रहालयों को समकालीन समाज में होते बदलाव से पृथक न रहना चाहिए और न ही वे हैं।किसी संग्रहालय की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितनी जल्दी और संपूर्णता से समुदाय के साथ एकाकार हो जाएँ।"
दर असल, सन् 1990 के समय से सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय शिक्षा और रोज़गार के अतीत बता रही है।'सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ ट्वाॅयलेट्स (Sulabh International Museums of Toilets ) ने समूचे विश्व में हर जगह पूर्व में किस तरह का शौचालय का उपयोग किया जाता रहा है।वह सब 'ट्वाॅयलेट म्यूज़ियम ' में दिखाने का प्रयास किया गया है।सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक,सुलभ-आंदोलन के जनक,समाज-सुधारक,पद्मविभूषण जैसे अनेकानेक सम्मान से सम्मानित डाॅ.बिंदेश्वर पाठक जी का कहना था कि --------------
" संग्रहालय शिक्षा तथा जागरूकता-अभियान के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का वाहक है।मेरा यह ढृढ़ विश्वास हो गया कि कोई भी संग्रहालय चाहे वह सामान्य हो अथवा किसी सुसंदेश देता है।सुलभ कोई अपवाद नहीं है।"
लिहाज़ा सुलभ इंटरनेशनल शौचालय संग्रहालय वैसे समाज के उन हकीक़त,सच्चाई को बयां करता है,लोगों की पीड़ा,दर्द और उनकी आह को बयां करता है।शौचालय के इतिहास को समझने की आत्मिक बोध जो प्रदान करता है,जो शौचालय के इतिहास से बीते युग की झलक दिखाती है।कुछ नया सीखाती है,शिक्षा प्रदान करती है।बीते युग में किस प्रकार के शौचालय का इस्तेमाल होता था।उसकी याद दिलाती है वह 'सुलभ इंटरनेशनल शौचालय-संग्रहालय ( Museums of Toilets ) है।सुलभ ट्वाॅयलेट संग्रहालय में सबसे अनोखा और विशिष्ट चीज है, फ्रांस के सम्राट लुई-XIV ( 1638 - 1715 ) के सिंहासन की प्रतिकृति,जिसमें छुपा था कमोड, जिस पर वह शौच करते हुए जनता से परस्पर संवाद किया करते थे।
वहीं दूसरी तरफ, रानी एलिजाबेथ-I के राजकवि 'जॉन हैरिंग्टन ' ने सन् 1596 में प्रथम डब्ल्यू.सी का आविष्कार किया।उसने वास्तव में दो डब्ल्यू.सी बनाया ----------- एक अपने लिए और दूसरा महारानी एलिजाबेथ---I के लिए, जिसे 'रिचमंड राजमहल ' के शौचालय में लगाया गया।
एक अंग्रेज राजा के चलंत ( पोर्टेबल ) शौचालय की अद्भुत और काफ़ी दिलचस्प कहानी यह है कि जब वह शिकार के लिए बाहर जाता था,तब वह ठंड और हवा से बचाव के लिए उसमें 'मखमल का अस्तर ' लगा दिया जाता था।सुलभ-आंदोलन के 'जनक', समाज-सुधारक,पद्मविभूषण से अलंकृत डाॅ.विंदेश्वर पाठक जी का सिर्फ़ शौचालय बनाना ही उनका लक्ष्य नहीं था।वे चाहते थे कि लोग समझे।' स्वच्छता का इतिहास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है,जितना उसका वर्तमान।जैसे ही आप इस म्यूज़ियम के अंदर कदम रखते हैं,आप 2500 साल पीछे चले जाते हैं।यहाँ रखे हैं प्राचीन रोमन साम्राज्य के सामूहिक शौचालय।वास्तव में, यह सच है कि शौचालय व्यवस्था,निकासी और जल-आपूर्ति को बेहतर, सुंदर और व्यवस्थित बनाने हेतु रोम के लोगों ने बहुत कुछ किया।ईसा पूर्व 7वीं शताब्दी के रोम के 'क्लोका मैक्सीमा' विश्व की सबसे पुरानी निकासी व्यवस्था है।
हालांकि रोम के एट्रूरिअन ( Etrrurian ) शासक 'लूसियस तारकुईनियस ' को इस 'क्लोका मैक्सीमा ' के लिए याद किया जाता है।वहीं दूसरी तरफ, परशिया की सेना की बदतर हालत और दुर्दशा देखते हुए रोम के निवासियों ने स्वच्छता पर विशेष बल देने में कोई कसर नहीं छोड़ा।इसी कारण से फ्रांस और मिस्र में वाल्टर -- क्लोजेट ( W.C ) बहुत लोकप्रिय हुआ............................
वहीं दूसरी तरफ प्राचीन समय में ऋषि मनु ने अपनी पुस्तक 'मनुस्मृति' में सैनिटरी तरीकों के बारे में काफ़ी विस्तार से लिखा है।उस वक्त लोगों को नदियों या तालाबों में मल-मूत्र त्याग करने से मना किया है।हालांकि उन्हें मल-मूत्र त्याग के लिए धार्मिक स्थलों से कुछ दूर जाने की सलाह दी जाती थी।लिहाज़ा 380 ईसा पूर्व में अरस्तू ने अपने शिष्य अलेक्जेंडर महान् को यह जानने का आदेश दिया था कि मनुष्य हों या पशु , उनके मल का निपटान कैंप से दूर ले जाकर किया जाएं।200 ईसा पूर्व में रोम के लोगों ने एंटोनिनस स्नानघर का भी निर्माण किया,जिसमें शौचालय के लिए 1600 छिद्र थे।यह एक प्रकार का से सामुदायिक शौचालय था,जिसमें सफाई के लिए अंदर पानी बहा करता था।सन् 1843 में इंग्लैंड में निकासी सुविधा और शौचालय पर 'फ्रेडरिक एन्जेल्स ' ने गहन शोध किया। फिर सन् 1847 में स्वच्छता कानून पारित हुआ।
हालांकि इसी साल लंदन में निकासी व्यवस्था को बड़ी तन्मयता के साथ संपन्न किया गया।पर्यावरण को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए साउथवुड स्मिथ ने पर्यावरणीय स्वच्छता अभियान शुरू किया और उसके परिणाम स्वरूप लोक- स्वच्छता कानून पारित हुआ। वहीं दूसरी तरफ सन् 222 में रोम के राजा हीलियोगाबास ( Heliogabas ) की हत्या भी शौचालय में हुई थी।इंग्लैंड के राजा जेम्स - 1 की हत्या भी मुख्यत: शौचालय में हुई थी।
हालांकि 'ओल्ड टेस्टामेंट ' में , राजाओं की चौथी किताब में यह वर्णित है कि जेहोवा के अनुयायियों ने पैगन बार की समाधि को ध्वस्त करके वहाँ शौचालय का निर्माण कर दिया था।वहीं सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् डाॅ.के.के.मुहम्मद का कहना था कि सम्राट अकबर अपने शौचालय में एक घंटे तक रहा करते थे,जिसमें तुर्की हमाम की अतिरिक्त सुविधा थी।हालांकि कई कवियों और सुप्रसिद्ध विद्वान, लेखकों के बारे में यह कहानियाँ काफ़ी प्रसिद्ध और दिलचस्प है कि उन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठ,उत्कृष्ट रचना शौचालय में बैठकर रची है। आधुनिक द़ौर में यह सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि विज्ञान ने मनुष्य के जीवन को काफ़ी खूबसूरत,सुविधाजनक और आरामदायक बना दिया है।दिन-प्रतिदिन विज्ञान के नए-नए आविष्कार होने से मनुष्य के जीवन में काफ़ी बदलाव आया है। बिजली और इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रयोग से हर क्षेत्रों में निरंतर प्रगति हुई है।
सन् 1929 में एक अमेरिकी बिजली मिस्त्री (इलेक्ट्रीशियन) एलबर्ट स्टाॅलवर्थ ने सर्वप्रथम ठंड की रात्रि में उपयोग के लिए एक इलेक्ट्रिक चैंबर - पाॅट का निर्माण किया और उस पर रबर और एस्बेस्टस की सीट थी, जो ऊपरी किनारों के चारों ओर गोलाकार में थी तथा धातु की पट्टी लगी थी।यह अभ्रक स्ट्रिप के बीच प्रतिरोधी तार को घेरती थी। वहीं अमेरिका में आविष्कार किया गया ' इंसिनोलेट' आमतौर पर एक बिजली चालित शौचालय है, जिसमें पानी के उपयोग की आवश्यकता नहीं होती है।यह मानव-मल को क्षण-भर में जलाकर राख में परिवर्तित कर देता है।आज के आधुनिक समय में शौचालय सिर्फ़ जन-मानस की ज़रूरत मात्र नहीं,वरन् शरीर के आधारभूत कार्य हैं।दरअसल जापान की 'मतसुशिता इलेक्ट्रिक' ने एक ऐसी शौचालय सीट का निर्माण किया, जिसमें इलेक्ट्रोड लगा हुआ था। यह इलेक्ट्रिक से चार्ज हुआ करता था।इसी को देखते हुए बाद में विरोधी कंपनी 'आइनैक्स ' के इंजीनियरों ने एक नए शौचालय का निर्माण किया, जो अंधेरे में चमकता था और इन्फ्रारेड सेंसर के ज़रिए मानव-स्पर्श करते ही अपने ढक्कन खोल देता था।इस शौचालय को प्रयोग करते ही इसमें छह प्रकार के संगीत की ध्वनि को सुना जा सकता था, जिसमें चिड़ियों की चहचहाहट और पानी के बहने की शोर अथवा ध्वनि सुनाई पड़ती थी।
बाद में जापान में ' टोटो ट्वाॅयलेट ' भी वेलीआउल के साथ सामने आया।यह ट्वाॅयलेट का निर्माण अनोखे तरीकों से किया गया था, जो स्वत: ही उपयोगकर्ता के मूत्र की चीनी (शुगर )
के स्तर को नापता था।लिहाज़ा शौचालय लोगों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र होता है।' हांग-कांग' के लाम साई विंग ने, जो एक गहने की दुकान चलाते थे, उन्होंने दुकान में ही एक विशेष प्रकार का शौचालय का निर्माण करवाया।शौचालय में बाॅल,वाॅश बेसिन, शौच-ब्रश ,आईना का फ्रेम , दीवार टाईल्स और दरवाजा के साथ-साथ दो कमोड- सभी 24 कैरेट सोने के बने हैं।ठीक इसके पहले सन् 1966 में शिकागों में एक ट्वाॅयलेट कब्ज से निपटने के लिए नितंब-उत्तेजक यंत्र के साथ विकसित किया गया।शौचालय के माध्यम से उल्लेखित कथाओं और कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि मानव जीवन के लिए जितना महत्त्वपूर्ण 'खाना' है, उससे कहीं ज़्यादा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है 'शौचालय'। शौचालय की कहानियों से यह संदेश मिलता है कि जहाँ तक मानव - स्वास्थ्य का सवाल है, रसोईघर का जितना महत्त्व है, उससे कहीं ज़्यादा महत्व शौचालय को भी देना चाहिए। शौचालय की कुछ कहानियाँ समाज के उन हकीक़त को बयां करती है कि मनुष्य ने शौचालय पर ठीक ढंग से ध्यान नहीं दिया।जिसकी वजह से हमारा यह समाज हजारों वर्षों से शौचालय जैसी सुविधाओं से वंचित रहा है।यह समाज शौचालय पर ध्यान नहीं देने की वजह से सदियों से पीड़ित रहा है।
( शेष फिर कभी )
@WriterGauravJha
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