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कविता --- राह में वो बढ़ता है। रचनाकार:- गौरव झा

प्रेम है सागर से गहरा,
भाषा इसकी बहुत सरल
जाने जो प्रेम की भाषा
नफरतों में भी प्यार खोजता,
सदा इतिहास गवाह रहा,
ठोकरें खाकर देता वहीं
समाज को एक नयी परिभाषा।
जीवन हैं संघर्ष के धागे जैसा,
हल्के में न समझो ऐसा-वैसा
जो पर्वत शिखर पर चढ़ता है,
हौसला आगे बढ़ने की रखता है,
लाख कांटें चुभे, फ़िर भी
आगे हमेशा राह में वो बढ़ता है,
जो पथ में राही बनकर चलता है,
लाख विपदाएं, झंझावतों से,
जो कभी नहीं घबराता है,
वहीं हमेशा जीवन में बढ़ता है।
हो तुम सृजन के बीज,
अंकुरित होकर पौधे बनते हो,
हरियाली,फल देकर तुम,
मानव को हमेशा देते हो,
लेने की नहीं तुम्हारी चाह,
केवल देते जाते हो...........
हे सुक्ष्मदर्शी!तुम हो राष्ट्र निर्माता,
अपनी कल्पनाओं, चिंतन से
समाज को देते हो नया रुप
भू पर सृजन के बीज बोकर,
राष्ट्र का इतिहास बताते हो,
कभी दिनकर,अटल, महादेवी
के गीत, कविता  सुनाते हो।
टूटे,हताश,भटकते  मन को,
तुम पथ बनकर राह दिखाते हो।।

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