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विनम्रता शब्द में छुपी है "सफलता का राज"(Writer Gaurav Jha)

जीवन में आगे बढ़ने का एक मात्र मूलमंत्र है 'विनम्रता'।इस शब्द के अंदर इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े चट्टान को भी पिघला सकती है।विशाल पहाड़ों को भी अपने क़दमों में झुका सकता है। हमें यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आज के दुनिया में इस चीज़ को अपनाना सरल और सहज कार्य नहीं है लेकिन मुश्किल भी नहीं है।या हम यूं समझने का प्रयास करें कि फूल पर मधुमक्खी इसलिए नहीं जाती है कि उसे फूलों से प्यार होता है बल्कि वह फूलों के अंदर कि खूशबू ही उसे खींचकर ले जाती है।चाहे वह फूल पर कितनी भी देर बैठा रहे?फूल उसे कुछ नहीं कहती हैं।इसका भी कारण हैं कि फूल अपने गुणों से उसको परिचित करवाना चाहती है।वो अपने गुणों को दूसरों के समक्ष बखान नहीं करती है,पर गुणवान् कीट-पतंगों भी उसके गुणों को पहचानकर उसके पास आती है। विनम्रता शब्द का मतलब केवल यह नहीं है कि हम केवल एक-दूसरे प्राणियों को समझें।वरन् हम सामाजिक प्राणियों के साथ-साथ पशु-पक्षियों, पेड़-पौधे की आवाज़ को समझने का प्रयास करें।इसे अपनी अंतरात्मा से महसूस करें।अब एक सवाल हम सबके ज़हन में अवश्य हिलोरें ले रही होंगी कि आख़िर समस्त मानव जातियों को समझना ही विनम्रता है।जी नहीं! इसमें कुछ हद तक सत्यता हो सकती है। लेकिन सृष्टि के समस्त प्राणियों को समझने के साथ-साथ उसकी भावनाओं को कद्र करना हम सबका ही कर्तव्य है।मेरी पंक्ति मुझे याद आ रही है----" विनम्रता एक ऐसी शक्ति का नाम है,जो अनंत सफलताओं की ओर अग्रसर करती है।"विश्व के जितने महापुरुष हुए हैं,चाहे वह विश्वगुरु विवेकानंद, माखनलाल चतुर्वेदी, राष्ट्रकवि दिनकर,ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आदि कई अनगिनत नाम हैं।जिनके जीवन में उतार-चढ़ाव,गहन समर्पण, संघर्ष रहा है।मेरा जहाँ तक मानना है कि इन बहुआयामी विभूतियों ने जीवन में सभी वर्गों के प्रति समान दृष्टिकोण थी।" एक व्यक्ति के अंदर की प्रतिभा,गुण को उसके विनम्र होने से भी जाना जा सकता है।"एक चीज़ कहना चाहूंगा कि किसी भी इंसान के अंदर विनम्रता बचपन से ही होती है।यह बच्चों में माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची के द्वारा आती है।या फ़िर समाज का भी प्रभाव बच्चों पर पड़ता है।जिस तरह का हमारा समाज रहता है,अच्छा है तो बच्चों के अंदर विकास सकारात्मक होती है और बुरा है तो मस्तिष्क में इसका प्रभाव बुरा होता है। शुरूआती दिनों में,आम बच्चे की तरह मैं  भी था।बचपन में स्कूल जाना, दोस्तों के साथ लड़ाई-झगड़ा करना।स्कूल में छुट्टी होने के बाद  दौड़कर घर आना।अपने स्कूल बैग को एक कोने में फेंक देना। छोटी-छोटी बातों पर  छोटे भाई-बहन  से लड़ना  एक आम बात थी। आख़िर बच्चों में शरारतें नहीं होगी तो जीवन उलझी पहेली सी लगती है। बचपना अवस्था को याद करता हूं तो मुझे ताज्जुब होता है कि नटखट का आनंद ही अलग होता है।अभी भी घर में शरारत करता हूँ। लेकिन पहले की अपेक्षा कुछ कम करता हूँ। ख़ैर इतने वर्षों के बाद याद करता हूँ,तो सिर्फ़ आनंद आता है।किसी के मुंह से बचपन की बातें सुन लिया तो बहुत ज़्यादा ख़ुश हो जाता हूं। अनायास कहता हूँ; अच्छा! सचमुच! मैं बहुत नटखट था।
         " समय जैसे-जैसे बदलता है, हरेक मनुष्यों में बदलाव होता है!"ऐसा हम प्राय: बुजुर्गो से सुनते हैं।यह सचमुच सत्य बातें हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मुझे विनम्रता शब्द को बड़े ही गुढ़ तरीके से समझने का अवसर ग्वालियर में मिला। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय ग्वालियर परिसर में दाखिला ले रखा था।काँलेज में एक-से-बढ़कर एक होनहार छात्र-छात्राएँ थे। सीनियर भी काफ़ी अच्छे थे। हरेक यूनिवर्सिटी में कुछ अपवाद तो होता ही है कि कुछ बच्चे सिर्फ मस्ती करने आते हैं। जिन्हें काम कम करना और नकरात्मक बातें करना ज्यादा पसंद होता है। मुझमें सदा से कमी कह सकते हैं या अच्छी चीजें कह सकते हैं कि कभी से नकरात्मक सोच रखने वाले लोगों के साथ रहना,बैठना पसंद नहीं करता हूँ।यह सही है कि हमेशा से भीड़ से अलग हटकर दौड़ने का प्रयास किया।मुझे हर-बार सफलता मिली है।भीड़ में अक्सर वहीं रहना पसंद करते हैं,जो दौड़ने का इंतज़ार करें। कुछ सीनियर ऐसे थे,जो मेरे विनम्रता, बोल-चाल के तरीकों और उत्कृष्ट कार्य के कारण सदा मेरा कद्र करते थे। मुझे समझने का प्रयास करते हैं। इसलिए मेरी नज़रों में वो अच्छे थे। कुछ सिनियरों में प्रिय भाई गिरिराज,समाधिया,नीरज मिश्रा, आदि कई लोग मेरे द्वारा की गई कार्यो की प्रशंसा करते थे।और कुछ लोगों मंद बुद्धि थे, जिन्हें ये पता नहीं था कि आख़िर हम यहाँ पर किसलिए आए हैं?मुझे इस बात की दुःख नहीं थी कि वह मेरा सम्मान नहीं करते हैं।दर असल दोस्ती में मैंने आज तक सम्मान नहीं खोजा।बल्कि सच्चे मित्रों के साथ हमेशा रहा। जिसके अंदर मुझे सकरात्मकता दिखती थी।उसके अच्छे विचारों का अनुसरण करता था।बुरे लोगों के प्रति मेरा ग़लत मक़सद कभी नहीं रहा।यह बात अवश्य रही है कि अगर वो ग़लत है,तो मुझे ग़लत नहीं होना है।यह सच बात है कि कांलेज समाप्त होने के बाद अपने अत्यधिक कार्य रहने के कारण चला जाता था। लेकिन जितनी भी देर उस सब के साथ रहा, मैंने  जीवन से जुड़कर पंक्तियां लिखी। मैं एक कवि हृदय था। इसके लिए मैंने किसी पर गुस्सा करना मुनासिब नहीं समझा।गुस्सा मुझे इसलिए नहीं आती थी कि वरिष्ठ साहित्यकारों, विद्वानों से विनम्रता के कारण संगति हो गयी थी।जब भी कांलेज के बाद समय मिलता।उन सबसे मिलना मुझे अच्छा लगता था। कुछ विषयों के बारे में जानने की ललक मुझे अनायास खींच रही थी।उसी कारण उनके संगति का असर मुझमें भी होने लगा था।ऐसा महसूस कर रहा था।उसी के बदौलत विचार जिस प्रकार आती गयी।रात्रि के समय अध्ययन करने लगा।उसके बाद लगातार कई राज्यों में समाचार-पत्र में मेरे आलेख, कविता प्रकाशित होने लगी।मुझे स्कूल, सेमिनार,कवि सम्मेलन में जाने का अवसर मिलता गया।इसका मूल कारण था--विनम्रता,हौसला,गहन समर्पण।जिसके बलबूते राह की ओर सदा अग्रसर होता चला गया।कठिन राह को भी हँसकर पार करता चला गया।यह बात सही है कि जीवन में कुछ सबसे अलग करने का प्रयास करोगे तो संभवतः शुरूआती दिनों मे लोगों को समझने में दिक्कत होती है आप जो कार्य करते हो,वह सिर्फ आप समझते हो।दर असल आपका मस्तिष्क दूसरों की अपेक्षा कृृृृृ













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