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कविता:-- कलम//गौरव झा

 हर गरीब, निसहाय
बेवश लोगों की अंतर्मन की,
व्यथा लिखती है कलम,
कभी ख़ुशी तो कभी ग़म
कागज़ को भिगोकर,
नए-नए शब्दों को हमेशा,
गढ़ती है क़लम!!
है यह दिखने में बहुत छोटी,
ताक़त है इसकी बहुत बड़ी,
बेजुबानों की आवाज़,
हर युगों में बनती है क़लम,
ज़ुल्म,अत्याचार के खिलाफ
ख़ुद यह महाशक्ति बनकर
लड़ती है मेरी क़लम!!
हर घरों के झलकते आँसूओं,
पीड़ा,वेदनाओं को समझकर,
चलती है क़लम!!
छोटी-छोटी राष्ट्र की कमियों
और खूबियों को उजागर
करती है प्यारी क़लम!!
भागदौड़ भरी ज़िंदगी के
हर मोड़ पर एक दोस्त की तरह,
हमेशा साथ देती है क़लम!!
प्रेम की भाषा लिखती,
समाज में पल रहें विकृतियों,
को भी मिटाती है क़लम!!
द्वेष,घृणा, नफ़रत को मिटाकर,
शिष्टाचार का हमेशा
पाठ पढ़ाती है मेरी क़लम!!
दूर करती यह हमेशा
नीचता,समाज में पल रहें,
बुराईयों,अपराधों को,
मिटाती है यह क़लम।।
यह भ्रष्टाचार,आतंकवाद
के खिलाफ एक हथियार,
बनकर लड़ती है क़लम।।
राष्ट्र पर जब-जब काले
बादल मँडराते हैं,
आग उगलती है क़लम!!
विपत्ति छाती है राष्ट्र पर,
लाखों बेजुबान लोगों की
आवाज़ बनकर ख़ुद,
क्रांति लाती है यह क़लम।।
पूँजीपतियों, मठाधीशों के,
ज़ुल्मो के ख़िलाफ़ आवाज़
बनकर आग उगलती है क़लम,
ग़रीब किसान, खेतिहरों, मजदूरों,
शोषित समाज का हौसला,
बनकर संदेश देती है क़लम।।
भाई-चारा,मर्यादा का पाठ
पढ़ाकर कोरे कागज़ पर
एक नया इतिहास लिखकर
अमन-चैन लाती है क़लम।।

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