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कविता//वीरों की कुर्बानी//कवि गौरव झा

हे नमन।उन वीरों को जो राष्ट्र के खातिर अपनी जान दे डाला था,
ब्रिटिश अंग्रेजों के हुकुमतों के ख़िलाफ़ जो आवाज़ उठाया था,
मौत और कफ़न हाथ में लेकर सरेआम जो बिना डरे सड़क पर जो चलते थे,
नमन है!भगत, चंद्रशेखर, राजगुरू को जिसने आजादी की चिंगारी पूरे देश में जलाई थी।
बहुत हुआ देश में अब आतंकी हमला,अब और नहीं होने देना है,
वतन के खातिर मरकर भी अब देश के मासूमों को ज़रा बचाना है।
मचा रखा है भीषण उत्पाद मठाधीश और कुर्सियों के पुजारियों ने,अब और न होने देना है,
हे राष्ट्र जागो!अपने अनगिनत राष्ट्र के वीर शहीदों के कतरा-कतरा खून का बदला अब तो लेना है।
है अगर सीने में हिम्मत तो ज़रा आगे आओ,पीछे से क्यूँ तुम लड़ते हो,
बेकसूर और मासूमों को क्यूँ तुम मार रहे, आगे आने से क्यूँ डरते हो।
हे कलम! अब सत्ता पे बैठे लालची मठाधीशों के खिलाफ एक हुंकार भरो,
अपने इस देश की खातिर क़लम की नोक से इस सबका  उद्धार करो।
जीवन है क्या?यह तो क्षणभंगुर है।मिट्टी ही है इक दिन इस देश की माटी में मिल जाना है,
लाख झंझावात और विपदाएं आए तो ग़म न कर तू,अपने देश को अहिरावण से बचाना है।
साँसे हैं जब तक इस तन में रोज़ तुम मातृभूमि के लिए कुछ काम करो,
अपनी मातृभूमि पर आँच न आने देंगे कभी,जीवन इसके  नाम करो।।
चंद्रशेखर, आज़ाद,भगत, बोस ने इस पावन मिट्टी से प्यार किया,
गाँधी, टैगोर, सुभाष ने अपना संपूर्ण जीवन इस पर वार दिया।
भटक गए हैं सत्ता लोलुप इस अंधे,बहरे और गूंगे जीवन के इस मोड़ में,
हे कलम!  राह दिखाओ इन्हें तुम ज़रा अब इस तूफ़ानी और झूठे दौड़ में।।
हे नमन! उन राष्ट्र के जांबाजों को,जो सरहद पर सब कुछ न्योछावर कर लड़ते हैं,
अपने भारत  की मिट्टी की रक्षा खातिर जो हर पीड़ा सहकर जो हँसते-हँसते मरते हैं।
सच्चे वीर सपूतों का अब तो हमेशा हौसला हमें ही अब बढ़ाना है,
इस हिंद की खातिर जान की बाज़ी देकर अब राष्ट्र को बचाना है।
अच्छे हैं वो लोग जो अपने हक के खातिर ज़िंदा रहकर वो  हर रोज़ लड़ते हैं,
देश में है ऐसे कितने जो सड़क किनारे ,बीच चौराहे पे भूखे पेट सो जाते हैं।

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