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कविता:-- मंज़िल

हार और जीत जीवन का हिस्सा है,
हार में जीवन नीरस हो जाता है,
जीत में आँखों में सुखों और आनंद
का छलावा,
जीवन है क्या?यह एक यात्रा है,
जहाँ ज़िंदगी में हार और जीत
दो पहलू हैं जीवन को समझने की,
यह सफ़र है हमेशा चलते रहने का,
अभी सफ़र में निरंतर बढ़ते जाना है,
पार करना है दूर तलक एक रोशनी
के सहारे,
मीलों दूर जाना है अभी मुझे,
चलते जाना है,जहाँ मुझे अपनी
मंज़िल और किनारा मिलेगा,
आशा, हौसला और दृढ़संकल्प से
पार करना है मुझे अपनी मंज़िल,
चलना सफ़र में बाक़ी है अभी शेष,
निराशा को दूर हटा
मन में आशा की डौर बाँधे,
उन्नत शिखर पे चढ़ना है मुझे,
है जीवन में अंधेरा बहुत,
लेकिन इक दिया तो जलता
है रोशनी के लिए......
दिया का काम है जलना,
अंधेरों में प्रकाश फैलाना,
इक रोशनी के सहारे दूर तलक
चलना है मुझे,
हौसला से बढ़कर दुनिया में,
कुछ नहीं,
राहों में हमेशा चलते जाना है,
दूर मंज़िल तक मुझे पहुँचना है,
यह सफ़र विराम का नहीं है,
अपने पथ से भटकने का नहीं है,
निरंतर चलते रहने का है,
कहीं मिल जाएगी मेरी मंज़िल,
इक रोशनी के सहारे,
भेदकर घोर अंधेरे और
तमस का सीना बढ़ते जाना है,
मिलेगी कहीं मेरी मंज़िल।

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