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कविता:--- माँ

किस राह गुजरेगा ये जो है ज़माना जानती हैं माँ,
अंधे दौर में सच का राह दिखलाना जानती हैं माँ।

हर मुसीबतों से ख़ुद सामना करना ये जानती है माँ,
घरों में अंधेरे में यह ख़ुद दीया जलाना जानती है माँ।

अभावों में घर को चलाना ख़ुद जानती है अपनी माँ,
परायों को सदा मन से अपना बनाना जानती है माँ।।

बुरे हालत में भी वह सदा ही मुस्कुराना जानती है माँ,
अपने दिल की राज़ चुपके से वो छुपाना जानती हैं माँ।

पढ़ी भले बेशक न हो लेकिन वो पढ़ाना जानती है माँ,
कभी कोई रूठे तो उसे वो ख़ुद मनाना जानती है  माँ।।

मुहब्बत की रोशनी को घर में  लुटाना जानती है वो माँ,
अपने अंदर हर ग़म को समेटकर सहना जानती है माँ।।

ब्रह्म,विष्णु,महेश ख़ुद माँ की गोद में खेलना चाहते हैं,
हर दौर में ख़ुद काम को  बेहतर करना जानती है माँ।।

बचपन में बच्चों को गोद में लेकर सुलाना जानती है माँ,
चोट गर लगे तो ख़ुद वो माथे को सहलाना जानती है माँ।

अमर गाथा है माँ कि  कोई न कभी जियादा जान सका,
उसे अंदर की कहानी को कोई न कभी भी पहचान सका।

समय के साथ चलना और घर को चलाना जानती है माँ,
अंधेरे मकां में भी ख़ुद दिया वो जलाना जानती है माँ।।

अपने अंदर के हर गमों को हमेशा पीना  जानती है माँ,
घर में रोते किसी बच्चे को हमेशा हँसाना जानती है माँ।।

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