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कविता:-- दहशत

मैं सोचता हूँ कि हर दिन
समाज में नया-नया
साँपों का प्रजाति का
बोलबाला दिखाई दे रहा है,

सोचता हूँ इससे बचने के उपाय
यह महज़ सिर्फ़ साँप
नहीं हैं यह ज़हरीले विषधर हैं,
जो समाज में अपने जहरीले
विष के प्रवाह से दुषित करना
चाहते हैं, कुरीतियों को बढ़ावा
देना चाहते हैं,
यह गर्त में मिलाना चाहते हैं समाज को,
आतंक और दहशतगर्दी के बल
पर अपनी सत्ता और आधिपत्य क़ायम
करना चाहते हैं,
यह रचना चाहते हैं इक नया अध्याय,
जो उनकी दहशत और आतंक को
बढ़ावा दे सकें और रोज़ बुन सके
नए-नए अपराधों और  आतंकों को,
तलाश करते हैं ऐसे विषधर रास्ता हर-दिन
जो सुनसान और एकांत हो,
जहाँ हर-दिन आतंक और दहशतगर्दी फैला सके,
यह एक ऐसी गहरी सुरंग से होकर गुजरता है,
जहाँ ना जाने कितनी युवा पीढ़ियां
इनके दहशत, कुकृत्य और अपराधों का शिकार हैं
रोकना होगा इनके बढ़ते हाथों को,

ना जाने इस आतंक की आड़ में कितने मासूम भी

दिन-प्रतिदिन आतंक को सब कुछ मान बैठते हैं

वो भी हरक़त करने लगते हैं,

रोकना होगा उनके बढ़ते हाथों को

अंज़ाम देते अपराधों और दहशतगर्दी से,

जो उसे पतन की ओर अग्रसर कर रहा है
जो आतंक और अपराधों के लिए उठते हैं,
बढ़ावा देते हैं अपराधों के लिए,
एक नया आतंक का शहर बनाने के लिए,
दहशत बुनने के लिए......................

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