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पिता पर हिंदी कविता : गौरव झा


पिता एक आस है, 
बच्चों की उम्मीद है
तो वह है एक पिता
न जाने यह गुमसुम
ख़ामोश होकर ज़िंदगी 
के हर मोड़ पर न जाने
कितने दर्द सहते हैं
वह है सिर्फ़ पिता
पर किसी से कभी
कुछ नहीं कहते हैं।।

अपने हृदय की असीम
गहराईयों के अंदर
दर्द समेटे रहते हैं,
कैसा भी हो डगर?
अपने अंदर हर दुःख-तकलीफ 
केवल ये हमेशा सहते हैं,
न जाने अपने मन में ये

 कितने दर्द छुपाते हैं,
फिर भी हर विपत्ति और झंझावतों में,
ये सदा मुस्कुराते हैं,

वो कौन है?
वह केवल पिता है,
ख़ुशी का लम्हा हो या दुःख का,
हर गमों को दिल में समेटकर
सदा ये ही हमेशा 
परिवार का समूचा बोझ उठाते हैं!!

पिता समूचे घर की नींव है
यह हर इक घर की शान है,
इनसे हर बच्चों की पहचान है।।

पिता बिन यह समूचा संसार
सूना है,
पिता परिवार का रथ का सारथी है,
जिस रथ का पहिया उन्हीं के हाथ में है।

पिता ही बच्चों की आस है,
पिता ही विश्वास है,
पिता से ही यह जग मेरा,
पिता बच्चों की सांस है।।

कष्ट जब होता है,बच्चे
जब बीमार होते हैं,
यह हमेशा पास रहते हैं
हर रिश्ता दिल से यही निभाते हैं,
नींद जब रात में नहीं आती,
यह बच्चे को पास सुलाते हैं।।

क्या कहूँ पिता बिना जग सूना?
लाख झंझावात आएँ 
या  आएं कोई विपदाएँ,
पिता के पैर न कभी डगमगाते है ं,
थक जाता हूं या खो जाता हूं 
इस दुनिया की भीड़ में,
पिता ही हैं जो हमें उठाते हैं,

ठोकर मारती है जब दुनिया
अपमानित करती है, तिरस्कृत करती है
ये पिता ही हैं जो हमें गले लगाते हैं।।
न जाने यह गुमसुम
ख़ामोश होकर ज़िंदगी 
के हर मोड़, हर पड़ाव पर,
 न जाने कितने दर्द सहते हैं?
वह है सिर्फ़ पिता
पर किसी से कभी वह
कुछ नहीं कहते हैं।।

पिता की आँखों में झांककर देखों,
न जाने कितने अनगिनत दर्द दिखेंगे?
वह हर ग़म-पीड़ा अपने भीतर छुपाते हैं,
फिर भी हर घड़ी सदा वो मुस्कुराते हैं!!!

थक जाता हूं या खो जाता हूं 
इस दुनिया की भीड़ में,
पिता ही हैं जो हमें उठाते हैं,

माता-पिता बिन यह जग सूना,
जैसे सूरज से लाली हो गायब,
इनके बिना है यह जीवन अधूरा।।

@ Gaurav JHA




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